सब कुछ खुदा ही करेगा, तो जीने का मकसद क्या है हमारा?
किसी जरूरतमंद का क्यूं हम ही न बन जाएं सहारा?
हो सकता है खुदा ने हमें चुना हो अपना बना के कासिद,
उसकी ज़िम्मेदारियां बांटने के लिए हो उसने हमें पुकारा।
क्या किसी के अश्क पोंछने में हमारी नहीं कोई गर्ज़,
किसी डूबते को हम कभी न दे सकें किनारा?
शायद वो हो उसका मुकद्दर जिसे बेकसी मिली हो,
क्या पता हमारा हो मुकद्दर उसका चलता रहे गुज़ारा।
गर चांद बन के किसी की ज़िन्दगी में न जगमगाएं,
क्या हर्ज़ है कोशिश करें बनने में किसी का सितारा?
इस दिवाली में जलाइए दिए किसी की ज़िन्दगी हो रौशन,
अंधेरे में वो बैठे हैं जिन्हें हो ज़िन्दगी ने मारा।
यह सुनहरा मौका मिला है, खुदा के बनें हम हिस्सेदार,
शायद यह जो हमें मिला है, न मिले कभी दोबारा।
शुभ प्रभात।
शुभ दीपावली।