एक चीज़ जिसके कब्जे में थी मेरी ज़िन्दगी उम्र भर,
और कुछ नहीं उस चीज़ का नाम है डर।
मुझे हर वक़्त वो कहती थी यह कर वह न कर।
धीरे धीरे ज़िन्दगी में बढ़ता गया उसका असर।
हर दम मुझे लगता था किसी की आंखें मुझे देखती हैं,
कुछ भी करूं या सोचूं उनको रहती है खबर।
यह भी लगता था नेकी न करूं तो जहन्नुम जाऊंगा,
पाप करने से कोई काट लेगा मेरे उड़ने के पर।
मौत के बाद मुझे उस आग में जलना होगा,
सैय्याद जहां फैंकेंगे मुझे पिला के ज़हर।
कामयाबी के ख्वाब न करते थे मेरी हौंसला अफजाई,
नाकामी का ख़ौफ जकड़ के करता था मुझे मुतासिर।
बढ़ों से और छोटों से मैं इसलिए डरता था,
मेरे कुछ भी करने से मेरी घट जाएगी कदर।
इस डर से इतना सहमा रहता था मैं,
अंधेरा ही अंधेरा था, कुछ न आता था नज़र।
फ़िर एक दिन खुदा मेरी ज़िन्दगी में आए,
उनके हाथ पकड़ने से मेरा डर गया है मर।
अब मेरी ज़िन्दगी में प्यार की किरणों का उजाला है,
काली डरावनी रात कट गई, देखता हूं सहर।
मेहरबानी खुदा की जिसने बना दिया मुझे निडर,
नए निशाने की खोज में डर घूमता है दर बा दर।
शुभ प्रभात।