i-Peg Poem of the Week #15
These poems are for my close friend Maj Vishwas Mandloi’s delightful group of tipplers called i-Peg. One has to raise a toast to the committed lot for their single-minded aim of spreading cheers!
The last one was titled ‘Peene Ki Wajah‘
Here is the 15th poem:
एक वक्त था जब जाम छलक जाते देखे,
अब मय की कीमत कुछ समझ में आई;
अब आंसू आंख के पलक में आते देखे,
पर होने नहीं देते हम मय की रुसवाई।
मैखाने में उनके संग हम पी लेते थे,
साकी की नज़र में भी था नशा अजीब सा;
ज़िन्दगी मुश्किल थी पर हम जी लेते थे,
रख लेते थे वह भी दिल मुझ गरीब का।
चले गए वोह, बदल गया माहौल-ए-मैखाना,
रह गए हम दो: मैं और मेरी तन्हाई;
वो भी दो हैं: भरी बोतल और पैमाना,
उनके संग ही हमने कई शामें बिताई।

तब एहसास हुआ कौन हैं मेरे असली हबीब,
किन्हें फर्क पड़ता है मेरे हॅसने या रोने पे;
कौन रहता है हरदम मेरे दीील के करीब,
किस का नाम लबों पे है जागते और सोने पे।
जाम को अब मैं कभी छलकने नहीं देता,
ज़िन्दगी भर का बन गया है संग अब इसका;
इस में कभी मैं आंसू टपकने नहीं देता,
फीका न पड़ जाए कहीं रंग अब इसका।


