आज फ़िर चांद अपना जलवा हमें दिखलायेगा,
शरद पूर्णिमा में ठंडी खीर हमें खिल्वाएगा।
उधार ली हुई अज़मत सही पर दिखता तो हसीन है,
आज तो पूरा नूर हमें रात को दिखाएगा।
क्या क्या ख्वाहिशें हैं हमारी चांद पे जा बैठें हम,
यह तो हमारा अपना है, हमें भी अपना बनाएगा।
सबसे बड़ी ख्वाहिश है, कुमारियों को मिले कुमार,
व्रत तोड़ते ही उनकी ख्वाहिश का असर आएगा।
हिन्दुस्तानी होने पे क्यूं कर हमें न फक्र हो,
सदियों से हमारी रिवायत है, कौन किसको बताएगा?
चांद, सूरज और सब सयारे हमारे इतिहास से जुड़े हैं,
हर किसी का त्योहार हिन्दुस्तानी ज़रूर मनाएगा।
राफेल की पूजा के गंदे लतीफे बेशक हमने बनाए,
पर अपनी सकाफत पे नाज़ करना कौन हमें सिखाएगा?