SHARAD PURNIMA KI BADHAYI

आज फ़िर चांद अपना जलवा हमें दिखलायेगा,
शरद पूर्णिमा में ठंडी खीर हमें खिल्वाएगा।

उधार ली हुई अज़मत सही पर दिखता तो हसीन है,
आज तो पूरा नूर हमें रात को दिखाएगा।

क्या क्या ख्वाहिशें हैं हमारी चांद पे जा बैठें हम,
यह तो हमारा अपना है, हमें भी अपना बनाएगा।

सबसे बड़ी ख्वाहिश है, कुमारियों को मिले कुमार,
व्रत तोड़ते ही उनकी ख्वाहिश का असर आएगा।

हिन्दुस्तानी होने पे क्यूं कर हमें न फक्र हो,
सदियों से हमारी रिवायत है, कौन किसको बताएगा?

चांद, सूरज और सब सयारे हमारे इतिहास से जुड़े हैं,
हर किसी का त्योहार हिन्दुस्तानी ज़रूर मनाएगा।

राफेल की पूजा के गंदे लतीफे बेशक हमने बनाए,
पर अपनी सकाफत पे नाज़ करना कौन हमें सिखाएगा?

JO BOYA WO PAYA

ये तुम्हें क्या मिला है, क्यूं होती है हैरानी?
जैसी करनी वैसी भरनी, यही है बात पुरानी।

“बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए”,
फ़िर तुम्हें तुम्हारे फल से इतनी क्यूं है परेशानी?

सबको चकमा दे लोगे, इसका न करो गरूर,
उसके दरबार में दूध का दूध, और होगा पानी का पानी।

खुदा ने बहुत कुछ दिया तुम्हारे हाथ में,
बस यूं कहिए तुमसे ही है तुम्हारी जिंदगानी।

फूल अगर हैं बोए तुमने, कांटे न उग पाएंगे,
बुढ़ापे में वो ही मिलेगा, जो थी तुम्हारी जवानी।

अपने कर्मो की तस्वीर खींच के दिल की एल्बम में रखना,
इन्हीं से बनती जाएगी तुम्हारी अपनी एक कहानी।

शुभ प्रभात।

MAIN KUCHH NAHIN

खुद को अहमियत देने से
खुदा को नहीं समझ सकते,
खुदाई तो इतनी बड़ी है,
तस्सवुर में भी न पहुंच सकते।

खुद को समझना ज़रूरी है,
लेकिन खुद को ना समझें ज़रूरी।
गर ज़माना आपकी अना पे टिका है,
तो यह है आपकी ही मजबूरी।

खुदी को कम करिए,
दूसरों के बारे सोचिए।
खुदाई का जो राज़ है,
अपने दामन में बोचिए।

जब आप समझ जाएंगे,
हर ज़र्रे के साथ जुड़े हैं आप।
फ़िर इसका भी एहसास होगा,
कायनात में अकेले न पड़े हैं आप।

कोई कहीं ऐसा नहीं,
जिसकी आपसे कम एहमियत है,
यही खुदा की पहचान है,
यही खुदाई की असलियत है।

शुभ प्रभात

NEKI KAR DARIYA MEIN DAAL

ज़िन्दगी में आते हैं ऐसे भी मुकाम,
सब ठीक करके भी तूं होता है बदनाम।

बहुत मेहनत से और लगन से किया काम,
न कहीं कोई ईनाम, न कहीं कोई आराम।

एहसान फरामोश हैं सब, नाजायज़ भी,
जिनके लिए दिन रात किए थे हराम।

और फिर कई ऐसे भी दोस्त मिले होंगे,
जिनके बगल में थी छुरी और मूंह में राम राम।

उदास और मायूस हैं तूं, क्या करूं, किधर जायूं,
क्या नेकी और सच्चाई का यही है अंजाम?

तेरी अच्छाइयां न गलत हैं न बर्बाद होंगी,
पर नतीजे के बारे सोचना नहीं है तेरा काम।

नेकी कर दरिया में डाल, अमली मशवरा है,
छोड़ सब खुदा पे और पा ले अपना आराम।

जो जो जिसको मिलना है, मिल के ही रहेगा,
खुदा की कर बंदगी, सब को झुक के सलाम।

लोगों के सकून – ए – रूह की न फ़िक्र कर, रवि,
सिर्फ अपने ही ज़हनी सकून का कर ले तू इंतज़ाम।

शुभ प्रभात

AAYIYE AAP BHI AAZMAYIYE

एक ज़बरदस्त नुस्खा है,
होंगे आप सुन के हैरान।
मरने वाले को भी गर मिले,
आ जाती है उसमें जान।

बिल्कुल मुफ्त मिलता है,
न किसी का कोई नुकसान।
मुश्किल तो बिल्कुल नहीं,
है सब दवा दारू से आसान।

न देने वालों न लेने वालों को,
देना है किसी को लगान।
न ही इसे खरीदने के लिए,
जाना है किसी दुकान।

कोई नहीं इस नुस्खे से,
कभी होगा अनजान।
किसी भी हालत में करेगा काम,
यह है मेरा ऐलान।

जानवर भी आजमाते हैं,
हम तो हैं फकत इन्सान,
इस नुस्खे को खूब बांटो,
और बन जाओ मेहरबान।

गमों के पहाड़ टूट रहे हों,
उम्मीद का न हो अनुमान।
कहीं से रौशनी न मिले,
न ग्रंथ, न बाइबल, पुराण या कुरान।

आखिर में कहूंगा नुस्खे के लिए,
यह है खुशियों का उन्वान।
अक्लमंद इसे पा लेने के लिए,
कर देते हैं सब कुछ कुर्बान।

बता रहा हूं अब मैं आपको,
हो जाएगा आपको भी गुमान:
होंठों पे रखिए इबादत,
चेहरे पे लाइए मुस्कान।

बांटिए इन्हें लोगों में,
बन के शुक्र गुज़ार इन्सान।
हौले हौले सब ठीक होगा,
आपकी मुस्कान, खुदा की पहचान।

शुभ प्रभात।

SAB CHANDRAMUKHI HAIN BECHARE

 

आजकल के सूरजमुखी सूरज नहीं देखा करते,
चांद को देख देख रात को हैं आहें भरते।

ताकतवर होने से क्या फर्क पड़ता है,
हसीन है उसी पर हैं लोग मरते।

कौन ताके सूरज को, ठीक है ज़िन्दगी देता है,
पर चांद न होता, तो हम तुम क्या करते?

ज़िन्दगी ही नहीं, रंग भी सूरज ने दिए हैं,
पर अब सूरजमुखी, चांद के लिए हैं संवरते।

माना मैं भी रवि हूं, सूरज से नाम मिला है,
इसलिए लिख रहा हूं मैं यह डरते डरते।

कई ख्वाब चांद के मेरे भी ज़ख्म बन चुके हैं,
आज फिर से ताज़ा हो गए उभरते उभरते।

KYA BURA HAI, KYA ACHHA HAI?

अच्छाई और बुराई पे कभी कभी इख्तियार नहीं होता,
जिसने हमेशा सब ठीक किया, ऐसा कोई हकदार नहीं होता।

जिसने अपनी ज़मीर से छुपाकर न कुछ किया हो,
गर गलत भी हो जाए वह शर्मसार नहीं होता।

अपनी रूह से पूछना क्या क्या वह लेके आई थी,
सब यहीं मिल जायेगा, क्या जन्मों का उधार नहीं होता?

एक ताज्जुब यह कई बार देखा है हमने,
गुनाह हो जाते हैं पर कोई गुनाहगार नहीं होता।

अपनी ही रूह से करो सवाल, जवाब ज़रूर मिलेगा,
उस जैसा जहां में कोई सलाहकार नहीं होता।

एक तड़प सी है, बेचैनी लगी रहती है हरदम,
पर जो यह राज़ समझ ले वह बेकरार नहीं होता।

यह वह शय है जो अंदर ही पैदा होती है, रवि,
इंसानियत का कहीं कोई बाज़ार नहीं होता।

शुभ प्रभात।

दशहरा मनाते हैं क्यूंकि अच्छाई की जीत बुराई पे हुई थी। किस को अब पता है क्या बुरा है क्या अच्छा है?

DHAI AKSHAR PREM KE

एक सलाह आज देता हूं, ज़रा गौर फरमाइए,
कुछ भी करिए ज़िन्दगी में किसी का दिल ना दुखाइए।

बदलना चाहते हो किसी को? मुमकिन है,
पर गुस्सा, नाकामी, और मायूसी भूल जाइए।

कयादत का सबसे बड़ा उसूल ही एक है,
ढाई अक्षर प्रेम के अपने हुनर में अपनाइए।

मुरझाया फूल हौंसला अफजाई से खिल उठेगा,
फिर आगे क्या होता है, देखते जाइए।

यही नुस्खा दोस्तों से, रिश्तेदारों पे भी आजमाइए,
जो गुस्से से न हो सके, प्यार से पाइए।

कड़वाहट से कभी कुछ अंजाम पे पहुंचा है कभी?
थोड़ी मिठास लाइए, हंसते हुए नतीजा पाइए।

कोई भी मंज़िल मुश्किल या दूर नहीं, रवि,
प्यार की डोर से खींचिए, अपने पास बुलाईए।

शुभ प्रभात।

ISE BHI PEHCHANO

लोगों को खुश करते करते
क्या तुम हो रहे हो उदास?
सबके नज़दीक जाते जाते,
देखा कोई नहीं है तुम्हारे पास?

यही सच है दुनिया में,
न रखो कभी किसी से आस।
दुनिया के पीछे भागने से,
दुनिया न आयी कभी रास।

लोगों को अपने आप से,
इतना भी न समझो ज़रूरी।
ऐसा न हो ज़माने का चलन,
बन जाए आपकी मजबूरी।

सीखो अपने पैरों पे खड़ा होना,
कुछ तो रखो दूरी।
यह न हो लोगों के बग़ैर,
ज़िन्दगी हो जाए अधूरी।

मैं नहीं कहता कभी,
बुरा है संग या साथ।
बहुत ही अच्छा लगता है,
अपने हाथों में किसी का हाथ।

पर कभी तो थोड़ा सा वक़्त,
अपने संग भी बिताओ,
यह जो अनोखे तुम हो,
कभी उसे भी पहचान जाओ।

मुश्किल नहीं यह समझना,
एक दिन ऐसा भी आएगा।
अकेला ही इंसान आया था,
अकेला ही वह जाएगा।

शुभ प्रभात।

ZINDAGI KYA KYA SIKHATI HAI

क्या अजब हकीकत है यह दोस्तो:

खुशी बढ़ती है बांटने से,
दर्द बांटने से घटता है,
गमगीन हों तो वक़्त बोझ है,
मुस्कराते बस यूं ही कटता है।

लेने से दौलत नहीं बढ़ती,
देने से हम होते हैं अमीर,
वो क्या गरीब जो किसी का ग़म खरीदे,
वो क्या अमीर जो बेच डाले ज़मीर?

क्या फायदा उस सच का,
जो किसी की ले ले जान,
क्यूं नफ़रत करें उस झूठ की,
जो आदमी को बना दे इंसान?

बहुत बोझ मिलते हैं उठाने को,
उठता नहीं बोझ गुनाहों का।
लोगों से तो नज़रें बचा लोगे,
क्या करिए अपनी अंदरूनी निगाहों का?

जो दूसरों के चुराएं ख्यालात,
वो तो बहुत मकबूल हैं,
वो बेचारे अकेले फिरते हैं
जिनकी अपनी तखील और असूल हैं।

सुनने देखने पे भी दोस्तो,
न करना कभी उसका यकीन,
जो मीठी मीठी बातें करे,
पर हो सांप ए आस्तीन।

शुभ प्रभात।

WAHAN PAIDAL HI JAANA HAI

हम सब को इस दुनिया से इक दिन जाना है,
यह आशियाना जो है, चार दिन का ठिकाना है।

इस होड़ में क्यूं रहें कि ज़माने से आगे निकल जाएं,
हम चले जाएंगे पर यहीं रहेगा जो ज़माना है।

गर याद रखें अपनी और दूसरों की अच्छाइयां,
फिर तो यह सफ़र हसीन और सुहाना है।

पर उन यादों को जो हमारा दिल दुखाती हैं,
हमें जितना जल्दी हो सके उन्हें भुलाना है।

कितने भी ऊंचे बन जाओ, बादशाह और शहनशाह,
हर किसी को उसके आगे सर तो झुकाना है।

यह छोटी सी बात कितनी आसान ओ आम है,
सब भूल जाते हैं, किस्सा वही पुराना है।

दिल लगाना दिलकश भले ही दिखता है,
सबसे बड़ी सज़ा है यह जो दिल लगाना है।

बहुत जी लिए यह करके, वह करके, रवि,
अब इस मुकाम पे पहचाना, यह सिर्फ जीने का बहाना है।

शुभ प्रभात।

BAHUT DIYA DENE WALE NE TUJHKO

जो कुछ मिला है वही है तुम्हारा,
चल तो रहा है अच्छा गुज़ारा।

दूजे की झोंपड़ी देख जलन क्यूं हुई है,
उसकी कार है आलीशान अपनी है ख्टारा।

क्यूं शुक्रगुजार नहीं जो रब ने दिया है,
क्यूं लगता है हमें मिला है कम उसे मिला है सारा?

न जाने क्यूं यकीन नहीं आता,
खुदा देखता है, है उसी का सहारा?

उसको पता है किस को क्या और कब देना है,
सबकी लिखी है, कोई जीता न कोई हारा।

सबसे ज़्यादा अमीर वह नहीं जिसके पास बहुत है,
वह है अमीर जो दे उसे जो लगे बेचारा।

मेहरबानी खुदा, जो है वह तूने दिया है,
तेरे सजदे में हूं हर रोज़ दोबारा।

कोई मरता नहीं, रवि, लाचारी से कभी,
हमने देखा है जिन्हें लालच और रश्क ने मारा।

UNGLI UTHAO PAR APNI TARAF

बहुत नाराज़ था यह सोच के,
लोग कैसे बदल जाते हैं:
आज उनके जो पसंदीदा ख्याल हैं,
कल उनसे उन्हें नफ़रत थी।
उनकी कल की महबूब राए,
आज कचरे के डिब्बे में पड़ी है।
रंग बदलते हैं छिपकली की तरह।
कैसे कैसे लोग है?
बा उसूल बनना कौन सिखाएगा इन्हें?

सुबह जब नींद से जागा,
बिस्तर पे लेटे,
अपना माजी याद आ गया,
मेरे अपने कई ख्याल,
अपने कई यकीन,
वह नहीं हैं जो तब थे,
जिन पे मैं मर मिटता था।
कितना बदल गया हूं मैं?

ज़िन्दगी का खूबसूरत सबक सीखा:
अंदर झांक के देखो,
नींद से जागो,
अपना पराया नहीं,
पराया भी अपना है।
कुछ भी मुकम्मल झूठ नहीं,
कुछ भी हमेशा सच नहीं।
मैं भी वही हूं,
जो मैं सोचता हूं लोग हैं।

“बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय;
जो दिल खोजा आपनो,
मुझसे बुरा न कोय।”

शुभ प्रभात।

KAR LO DUNIYA RAUSHAN

मैंने देखा था एक ख्वाब,
एक सबेरा ऐसा उगेगा
सूरज के चढ़ते ही,
बीमारी और लाचारी,
ग़रीबी और बेकसी,
खौफ और मौत,
नफ़रत और बुराई,
पिघल जाएंगे
बर्फ की तरह।

हर तरफ दिखेंगे,
प्यार और प्यार
अमन और इंसानियत,
उम्मीद के चिराग।

फिर देखा:
सब यही है जहां मैं हूं,
जहां सब हैं।
किरण सूरज की ही नहीं,
लौ दिल में भी जलती है।
इसकी रौशनी सूरज से
कई गुणा ज़्यादा है।
जगने दो,
और रौशन होने दो,
दुनिया
अपनी भी और दुनियावालों की।

शुभ प्रभात।

SOORAJ KO TO DOOBNA HI HAI

चुप रहने की आदत अब मुझे भाने लगी,
तनहाई में अपनी ही याद मुझे आने लगी।

तरसते तरसते सारी ज़िन्दगी यूं गुजरी है,
ज़िन्दगी की ख्वाहिश मुझे तरसाने लगी।

एक सांस ही तो थी जो मेरी हमसफ़र रही,
शमा की लौ की तरह वह भी थर्राने लगी।

अपनी मासूमियत मैं खो बैठा तालीम – ऐ – हयात की आरज़ू में,
आखिर मासूमियत ही मुझको राज़ – ऐ – हयात समझाने लगी।

आंख तबस्सुम की झलक दिखलाती रही,
अब रह रह के अश्क बहाने लगी।

रात भर मैं सुनाता रहा गम – ऐ – ज़िन्दगी की दास्तान,
सुबह होते ही वह मुझे सुनाने लगी।

एक तस्वीर को दिल के करीब रखते रहे हम,
न जाने क्यूं वो आज झिलमिलाने लगी।

सोचते थे इसका नशा है कभी नहीं उतरने वाला,
यह मुकाम आया जब जवानी आंख चुराने लगी।

हर बात पे हर लम्हे पे मैं हंसता रहा, रवि,
क्या बात है अब हर बात मुझे रुलाने लगी।

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