रफ्ता रफ्ता ज़िंदगी बन जाती है इल्ज़ाम,
हर एक शख्स नजर आता है गुनहगार l
जैसे पास आता है हम सबका अंजाम,
रेत गिरने की तेज़ लगती है रफ्तार l
वह वहाँ गलत है, मैं यहां सही हूँ,
कब ख़त्म होगा यह सिलसिला l
वह भी अभी वहीं हैं, मैं भी यही हूँ,
ज़िंदगी से किसको कहाँ क्या मिला?
बढ़ती ही जाती है इल्ज़ाम की किताब,
मिले हैं अपनों से धोखे और फरेब l
अदालत से ही मांग रहे हैं हिसाब,
वकीलों की दोनों ही भर रहे हैं जेब l
एक नए सूरज की उम्मीद में हम,
अपने आप को रोज़ देते हैं दिलासा l
रिश्तेदार और दोस्तों के भूल के रहम,
पैसे और जायदाद पर किया है भरोसा l
अरबों की सीरत गवां देते हैं लोग,
ताकि जायदाद से मिले मुफ्त के पैसे l
पुर्जे पुर्जे में अब बस गया है यह रोग,
वर्ना तो हम कभी ना थे ऐसे l
हमारी जंग इंसाफ और अच्छाई की है,
किसी तरह उस कमीने को सबक सिखाना है l
उसकी बुराई के सामने हमारी सच्चाई खड़ी है,
आख़िर में यही तो दुनिया को दिखाना है l
बस फैसला अब होने को ही है अदालत में,
लुत्फ आएगा जब हम जाएंगे जीत l
ऐसे ख्वाबों से हम हैं उस हालत में,
जहां जहन्नुम में जाएँ भाई बहन और मीत l
जायदाद और पैसा बन गई है अब,
हमारी पूरी ज़िंदगी की कमाई l
और पूरे ज़माने को इस का हो सबब,
हम में है अच्छाई और उस में है बुराई l
कल हम ना होंगे, हमारे बरसों जाने के बाद,
हमारी नेकी के ज़ोरों से बजेंगे ढोल l
माँ बाप की जल्द ही मिटा देंगे हम याद,
और कमीने भाई की खोल देंगे पोल l
ज़िंदगी का हमें ना मिलता मकसद,
अगर माँ बाप की ना होती जायदाद l
अपने ही भाई की इज्ज़त हो जाये गर्द,
वही था और है सारे जड़-ए-फ़साद l
उसे रुसवा ना किया तो हमें है शक़,
वह सारी ज़मीन कर लेगा हड़प l
वारिस हैं हम भी हमारा भी है हक,
भूल जाते हैं आसानी से रिश्तों की तड़प l