एक ज़माना था जब हमें लगता था डर,
रात को पर्दा हिले तो हम देखते थे इधर उधर।
सांप के बारे सोच के तो जान निकल जाती थी,
कब कहीं पास में आके वह कर दे फर्र फर्र।
भूत प्रेत पर हालांकि मैं नहीं करता था यकीन,
फ़िर भी सोचता था क्या होगा मिल जाए कहीं अगर।
शेर चीते और हाथी का इतना खौफ रहता था,
कि यह हम आदमियों को खाते होंगें पेट भर।
क्लास में अपने उस्तादों से तो मैं यूं डरता था,
कि यह कच्चा चबा जाएंगे मेरी नादानियों पर।
पुलिस, नेताओं और बाबुओं से मैं इसलिए डरता था,
रिशवत लेने के लिए ही बने हैं ये हम सबके लीडर।
और बहुत से डर थे जिन्हें बयान करना है मुश्किल,
एक तरह से ज़िंदा था, और एक तरह से गया था मर।
फ़िर एक दिन, यारो, मेरी शादी हो गई,
अब उसके मुकाबले में कोई और नहीं है डर।
उसका अपना खौफ कुछ इतना बुलंद है,
उसके सामने सारे डर कांपते हैं थर्र थर।
हम सबको यारो बीवी बना देती हैं,
अपने लिए चूहा पर औरों के लिए निडर।