मज़हब के मुग़लिबों की क्या दे हम दुहाई,
इन्सान को बना देते हैं मुसलमान, हिन्दू और ईसाई।
दुनिया को तक़सीम करके ये करते हैं राज,
पैदा तो हुए थे सब बहन और भाई।
मज़हब नहीं कहता पर ये कहते हैं,
माजूदा वक़्त छोड़ के ये माज़ी में रहते हैं,
डराते हैं हमें मौत से, गुनाह से, बुराई से,
खुदा से ज़्यादह हम इनके ज़ुल्म सहते हैं।
ईष्वर एक है यह ये भी मानते हैं,
पर अपने वाले को सबसे बेहतरीन जानते हैं,
कहते तो हैं वाइज़ आपस में बैर न करो,
पर करते हैं वही जो मन में ठानते हैं।
सबसे बड़ी लड़ाईयां दीन ओ धर्म की हैं,
बात तो दोस्तो यह बहुत शर्म की है।
धर्म के मतलब इनसे क्यूं सीखे हम,
अपनी अपनी सोच और अपने कर्म की है।

हे खुदा, दुनिया को कर दे मज़हब से आज़ाद,
सबसे बढ़ कर इसी ने किया इंसानियत की बर्बाद,
यह अब महज़ पैसा और ताक़त पाने का है ज़रिया,
हर मुग़लिब बढ़ाना चाहता है चाहने वालों की तादाद।
मेरे तस्स्वुर में आया है एक बहुत प्यारा ख्वाब,
जात पात और धर्म से लोग नहीं हो रहे ख़राब,
इस खयाल का भी वक़्त अब आने को है, रवि
शायद न करना पड़े इसके लिए कोई इन्कलाब।

