BORN FREE, BUT NOT BORN TO BE FREE

All of us are born free,
They would like us to believe,
But as soon as we’d hear and see,
They send our freedom on leave.

The first to make us enslaved,
Is memory with which we are born,
Generations of data is engraved,
Love, Fear, Amity, Jealousy and Scorn.

Then we have our parents,
With own and embedded ideas in mind,
They think they’re God’s only agents,
To teach us things of every kind.

Good and Bad is thus imprinted,
With each of their instructions,
You do exactly how they hinted,
Or gave you specific directions.

Already a puppet, you go to school,
To lose more freedom to knowledge of past,
They control you by the Book of the Rule,
And you thought you’d become an iconoclast.

And then you find a job with salary,
Your being bonded is now complete;
Your boss, at your expense, plays to gallery,
And you realise what poison is another man’s meat.

And if there is still some freedom left,
It is time for you to tie the nuptial knot;
You are finally, of all independence, bereft,
That, on being born, you had, from God, got.

And I haven’t talked about fads and habits,
That imprison you in their tight grip.
You hop from one to other like rabbits,
As if you are on a controlled trip.

The society and government keep you on leash,
Not ever wanting you to fall off the line,
There is no way you can carve an independent niche,
Unless you suddenly get powers divine.

Of particular mention is the bureaucracy,
That controls you from birth to death certificate.
It doesn’t matter if you live in democracy,
Rules and regulations make you suffocate.

There is, thus, only one way to redeem your freedom,
It is to happily embrace the messenger of Death;
And get back to Heaven’s Kingdom,
On Earth you are enslaved to your last breath.

OUTNUMBERED – PRIVACY TOTALLY VIOLATED!

Gone are the days when you could idly sit,
And gaze at the clouds changing shapes in the sky,
With intruders you didn’t have to match your wit,
You could let the time, at its own pace, fly.

And then came Internet, a great way to connect,
You lost your privacy, you are never alone.
You could link with people direct or indirect,
They’re there with you with just a click on the phone.

Together with this good, came a great evil,
Making you a puppet much against your choice,
All Applications, Service Providers turned into devil,
Against their barrage, you simply lost your voice.

“Select this”, “Click this” “To proceed further” they dictate,
They constantly vie for your time, money and attention,
You are outnumbered since they’re a corporate,
It is a nuisance and irritation of highest dimension.

They drown you in ads, queries, calls and offers,
Even those like cable tv that you pay in advance,
At your behest they strive to fill their coffers,
You don’t realise you have even lost life’s romance.

Privacy bills, DND etc are not taking us anywhere,
Laws in India never, to common man, provided relief,
A mass movement is required to be there,
In our Right to Privacy, to strengthen the belief.

We don’t want to spend hours every day,
To delete unwanted calls, ads, chats and many a mail,
We don’t want to be contacted even by those we pay,
With offers about making life better if we avail.

Else, if we continue being puppets in remote,
Of all these people and vested interests,
We would be herded like sheep and goats,
Or birds uprooted from their own nests.

Let’s insist with all applications, services and utilities
That they, not us, are constantly on call,
That we are the ones paying for the facilities,
Whilst, at our time and money’s expense, they have a ball.

EK CHHOTI SI GHADI

दाद दीजिये उसकी जिसने बनाई थी घड़ी,
आज तक कोई चीज़ ना बनी इससे बड़ी।

रोतों को हँसा दे हस्तों को रुला दे,
कई दफा तो लगे जैसे हो यह जादू की छड़ी।

घंटों लोग बैठे रहते हैं फुरसत ओ आलस में,
इसे देखते ही अचानक सबको जल्दी की पढ़ी।

बहुत तेज़ यह चलेे आशिक संग बिताये लम्हों में,
इंतज़ार में ऐसे लगे जैसे एक ही जगह हो खड़ी।

बीमारी की हालत में ऐसा दिलाये यह एहसास,
जैसे मरीज़ की नब्ज़ इसके संग ही हो जुड़ी।

कहीं गर यह आ जाये दहशत फैलाने वालों के हाथ,
टाइम बम की बन जाये यह एक खतरनाक कढ़ी।

ग़रीब की कलाई पे यह शर्मिंदगी से सर झुकाये,
अमीर की बाज़ू में दमके लाल ओ गौहर से जड़ी।

देखने में लगती है यह छोटी और ग़ैर अहम,
पर यकीनन ज़िन्दगी और मौत के बीच यह खड़ी।

EVERYONE HAS A MASK

कैसे करें हम असली या नकली की पहचान,
इन्सान दिखता है हैवान, हैवान नज़र आता है इन्सान।

बहुत चोट खाई है इस दिल ने उन लोगों से,
मिलते ही यूँ लगते थे जैसे हों हमारे मेहरबान।

कईयों ने तो हद्द ही कर दी यह जता के हमें:
मान ना मान मैं तेरा मेहमान।

हमने सोचा था वफ़ा करते हैं जो हमसे,
तैयार कर रहे थे वो हमारी मौत का सामान।

वो जिन्हे हम समझ बैठे थे बहारों की ग़ज़ल,
रफ्ता रफ्ता नज़र आने लगे खिज़ाओं का उनवान।

और कुछ ऐसे भी थे जो दिखते थे सैयाद,
करीब जब आये तो बने प्यार की पहचान।

आख़िर में उनके बारे क्या कहूँ मैं, रवि,
हंसते हंसते ले गए हमारे दिल ओ जान।

शक्ल से अंदाज़ा ना लगाना किसी के दर्द का कभी,
पुर सकून चेहरे में छुपे रहते हैं लाखों तूफान।

WHY NO FULL OROP – IN LIGHTER VEIN

Hasya Panktiyan of the Day #57

फौज के लिए सब Indian Political Parties का एक रवैया है:
देश की रक्षा फौज करे और उनकी रक्षा के लिए कृष्ण कन्हैया है।

फौज वह गन्ना है जिसका कभी भी कहीं भी निकालो जूस,
तनख्वाह, पेन्शन, और सहूलतों के लिए इन्हें दे दो घास फूस।

एक तो ये disciplined हैं, और discipline से है हमें नफ़रत,
ग़लत चीज़ करने के लिए ये कभी नहीं होते हैं सहमत।

दूसरे हर काम बेहतर करके ये सबको दिखाते हैं नीचा,
जैसे नेतागिरी, बाबूगिरी, सरकार, पुलिस, इनके बाप का है बगीचा।

ये तो ठीक है ज़रूरत आने पे हम इन्हें बुला लेते हैं,
जो काम किसी से नहीं होता हम इन्हीं से करा लेते हैं।

पर इन्हें क्यूं समझ नहीं आता के वोट बैंक में इनका नाम नहीं है,
और हमारा काम निकल जाए तो हमें इनसे काम नहीं है।

अब OROP को ले लो, तकरीबन 45 साल से हम कर रहे हैं implement,
Congress और BJP, हम दोनों ही अपने आप को देते हैं compliment.

जन्तर मंतर और बाकी देश में ये निकाल रहे हैं जलूस,
हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही देश वासियों को होता है महसूस।

एक तो यह होने से इनके discipline का होता है पर्दा फास,
दूसरे media यह cover नहीं करता, उसे देते हैं हम घास।

तीसरे OROP को लाते लाते सिर्फ 45 साल तो हैं हुए,
अजी कुछ तो रख लो 2019 में आने वाली सरकार के लिए।

बाकी खूब जय हिंद, जय जवान के हम भी लगाते हैं नारे,
पर कोई भी पार्टी हो, एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं हम सारे।

HOW TO GREET A NEW DAY?

For ten minutes after you awaken,
Close your eyes and thank God;
Let they not be for granted taken,
The endless bounties of the Lord.

He gave to us so many things free,
Without asking for anything in return;
Ears to hear and eyes to see,
Our life, air, water, moon and the sun.

Next, thank your family and friends,
Without whom life won’t be the same;
If you hurt anyone, resolve to make amends,
Wish them health, success and fame.

Next five minutes, on yourself, devote,
Admire the person you’ve become;
How kind and loving you are, just note,
Happy, healthy, fair and awesome.

Then think of all those in distress,
Not as well placed as you are;
Pray that God in his Goodness,
Would take their worries and anxieties far.

Now open your eyes and look at the day,
Let its freshness and beauty dawn on you;
Before ‘Good Morning’ anyone, to you, can say,
You have aptly greeted a day that’s new.

I am sure if you have done the above,
You have given your day an ideal start;
It would be a day full of joys and love,
Like a joyous dream close to your heart.

And lo, it takes only a quarter of an hour,
For you to usher happiness in your life;
It comes to you like butterfly on a flower,
Saying bye bye to pains, sadness and strife.

WHICHEVER PARTY WINS, INDIA LOSES

Hasya Panktiyan of the Day #56

सियासती दल बनाते बनाते क्यूं यह ख्याल नहीं आ रहा है,
के दल को अहमीयत देते देते मुल्क दल दल में फंसा जा रहा है।

‘पहले जो भी नज़रिया था हमारा, अब हमें उनसे उल्टा करना है’,
दलों के इस रवये से देश पीछे की ओर बढ़ता जा रहा है।

हकूमत बनाने की भी क्या मदहोश सरगर्मी है दलों के लिए,
जैसे तादाद बढ़ रही है उम्मीदवारों की, नशा सा छा रहा है।

एक तो हो जो कहे, “दल से ज़्यादह वतन प्यारा है मुझे,
क्या करेंगे उस दल का जो मुल्क को ही हरा रहा है?”

कितने अच्छे दिमाग हैं हमारे इस महान हिन्दोस्तान में,
फ़िर सियासत में सिर्फ गधों को क्यूं भर्ती किया जा रहा है?

वैसे तो खेलों में हमें बहुत कम मैडल मिलते रहे हैं,
पर हमारी horse trading की मास्टरी से पूरा जहाँन घबरा रहा है।

फौज को फज़ूल किया है border की हिफाज़त के लिए,
जब यह गंदा कीड़ा देश को अंदर से ही खा रहा है।

वोट, वफादारी, ज़मीर सब कुछ बिकाऊ है इनका,
अफसोस, ऐसे लोगों से हिन्दोस्तान भरता जा रहा है।

मुल्क बचाने के लिए कोई मसीहा ही पैदा हो तो, रवि,
वरना मुल्क बचाना अब मुश्किल होता जा रहा है

KYA YEHI HAIN JANTA KE SEWAK?

Hasya Panktiyan of the Day #55

आपस में मर रहे हैं, उलझ रहे हैं, लड़ रहे हैं,
हमारी सरकार हो, उसके लिए झगड़ रहे हैं।

कौन इनको बताए यह तमाशा नहीं लोक सेवा है,
वो जिसको करने के लिए सब दल बिगड़ रहे हैं।

हमने यह किया था, तुमने वो किया था,
यह कह कह कर आपस में अकड़ रहे हैं।

इस पार्टी के बंदे खरीद लिए, उन्हें हमने मना लिया,
यहां वहां से सबको हम पकड़ रहे हैं।

क्या सबको ही जनता का सेवक बनने का शौक है,
या power और पैसे के लिए नाक रगड़ रहे हैं।

क्या माइने निकाले हैं democracy के हमने,
Democracy बनाने वाले इसे देख कर सड़ रहे हैं।

क्या फूल लगाए थे आज़ादी दिलाने वालों ने, रवि,
अब वह वक़्त आया जब एक एक करके झड़ रहे हैं।

THANK GOD, I WAS ALWAYS RICH

शुक्रिया खुदा का जिसने बनाया मुझे अमीर,
खरीदता रहा ग़म सबके, कभी बेचा नहीं ज़मीर।

सारे ख़ज़ाने मिल गए ज़िन्दगी में बग़ैर मांगे,
जब कुछ भी ना था तब भी मैं ना बना फ़क़ीर।

किस को क्या मिले यह खुदा की नेमत है यारो,
बेचैनी किस बात की, सबकी अपनी अपनी तकदीर।

आज जिसको लाचारी समझते हैं रंजिश में,
कल वही बन सकती है खुदा की रहमत की तस्वीर।

तेरा मेरा, बढ़ा छोटा सब फरेब-ए-नज़र हैं,
वह कभी नहीं ग़रीब, जो दिल का है अमीर।

मुझको जो मिला, मेरी हैसियत से था ज़्यादा,
खुदा की ही थी बख्शिश, वही है दस्तगीर।

तेरे दर-ए-दरबार पे हमेशा सजदे में रहा रवि,
जो कुछ भी मेरा लगता है, तेरी ही है जागीर।

KAASH SHRAAB KE DARIYA HOTE

i-Peg Poem of the Week #12

These poems are for my close friend Maj Vishwas Mandloi’s delightful group of tipplers called i-peg. One has to raise a toast to the committed lot for their single-minded aim of spreading cheers!

The last one was titled ‘Main Peeta Hoon Kyun?

कितना अच्छा होता गर शराब के दरिया होते,
उसी का सब पानी पीते, उसी से कपड़े धोते।

इस दरिया में डूबने के हज़ारों बहाने बनते,
लोग इसमें डुबकी लगाते जागते और सोते।

ये दरिया हंसी के सागर तक सबको पहुंचाते,
जी हां, उनको भी जो हर वक़्त हैं रोते।

लोगों का लोगों से होता प्यार और भाई चारा,
सब लोग अमन और उल्फत के फूल पिरोते।

दीन ईमान के रखवाले ना फैलाते नफरत,
इसका अमृत पी के, रहम दिली के बाग बोते।

शैतान भी शैतानी और हैवानी भूल जाते,
खुदा की बेअंत सखावत में लगाते गोते।

यानि, सब गुनाहों ओ बुराईयों का एक ही हल है,
काश मय खुले आम बहती, काश शराब के दरिया होते।

HUM CRORON HAIN TO KYUN INKE PAAS CRORON HAIN?

Hasya Panktiyan of the Day #54

पुलिस के हाथ होते हैं लंबे,
जैसे हों बिजली के बड़े खम्बे;
पर अगर हों VIP अपराधी,
तो बोलो जय जय जगदम्बे।

हज़ारों करोड़ों का घोटाला,
विजय मालया ने कर डाला;
और फिर नीरव मोदी ने भी,
PNB का मूँह किया काला।

कई और हुए हैं फरार,
चाहे किसी की भी हो सरकार;
सब एक थैली के हैं चट्टे बट्टे,
सबका है एक ही परिवार।

यह तो चाहे हों किसी भी दल के,
पैसा लेते हैं हाथ ये मल के,
आम चोर को पकड़ लेते हैं,
VIP निकल जाते हैं छल के।

देश में लागू कई कानून,
ग़रीब का लगे पसीना और खून;
और अमीर चोरी कर के भाग ले,
लंदन, न्यू यॉर्क और रंगून।

अगले चुनाव में लगाओ धक्का,
पंक्चर कर दो इनका चक्का,
यह सब हों जेल के अंदर,
आम आदमी न हो हक्का बक्का।

AAPKE PYAAR MEIN HAMEN KYA MILA

आपके प्यार से क्या कुछ है हमें मिला,
फिर भी हमारे लबों पे शिकवा ना कोई गिला।

हम सोचते रहे आपसे मिलेगी जन्नत-ए-मोहब्बत,
क्या पता था ग़मों का शुरू होगा सिलसिला।

परछाईयां, तन्हाईयां, रुसवाईयाँ यूँ बढ़ती गयीं,
ना जाने जाम-ए-उल्फत में तूने क्या दिया पिला।

चले थे साथ तेरे, खुशी का बनाने कारवां,
उदासियों ने यकायक शामिल किया यह काफिला।

रास्ते कई थे प्यार की मंज़िल पाने के लिए,
हर रास्ता इधर उधर से तुझसे ही जा कर मिला।

मांगते रहे खुदा से कई तरह की मन्नते,
मेहरबानी तेरीे क्या कुछ तूने दिया दिला।

HAMEN YOUN JAANE NA DEEJIYE

रोक रखिये रात को, सुबह को आने ना दीजिये,
बैठे हैं आपकी बज़्म में, हमें यूँ जाने ना दीजिये।

आज तक हमने मानी है आपकी हर एक बात,
अपने आप को बढ़ चढ़ के, बातें बनाने ना दीजिये।

आपके साथ कई दिन बिताए थे हमने बहार में,
खिज़ा में बीते दिनों की यादों को सताने ना दीजिये।

प्यार में हमें बेहद खुशी का हुआ था एहसास,
चांदनी गयी तो अब आंसू बहाने ना दीजिये।

ग़म-ए-हिज्र की होने को है अब इन्तहा,
ग़म-ए-हिज्र में बेसबर मर जाने ना दीजिये।

आपकी आंखों ने पिलाये थे जाम उल्फत के,
आंखों से अब बेवफाई के पैमाने ना दीजिये।

खाये हैं इस दिल ने हजारों धोखे और फरेब,
दिल को और ज़ुल्म ओ सितम उठाने ना दीजिये।

आपके एहसान तले जल गया आशियां मेरा,
हो सके तो मुझे और ऐसे नज़राने ना दीजिये।

आपकी वफ़ा की गलत फहमी से ज़िन्दा हैं उम्मीदें,
उम्मीदों को इस तरह बेमौत दफनाने ना दीजिये।

रुखसत के बाद भी हम याद आएंगे, रवि,
बीती यादों को तन्हाई में तड़पाने ना दीजिये।

AB AUR NA KARVA INTEZAAR

बुझी नहीं है दिल में अभी हसरतों की आग,
सूखे नहीं हैं ज़िन्दगी में अभी चाहतों के बाग।

रात के घने घनघोर अंधेरे में अभी तक,
नज़र आते हैं तेरी हसीन आँखों के चिराग।

लौ जलती है तेरे तबस्सुम की आज भी,
छिप जाते हैं उसमें मेरे दिल के दाग़।

बिगड़ गया रूप और रंग, चाल ढाल मेरी,
अभी भी काम कर रहे हैं दिल ओ दिमाग।

बस एक बार मिल ले मुझे, जान-ए-मन,
इस से पहले मैं ले लूँ ज़िन्दगी से बैराग।

JISMANI SE MAIN BANA ROHANI

Hasya Panktiyan of the Day #52

हमें बहुत पसन्द थे पूरी छोले,
लेकिन हम थे उस वक़्त बहुत भोले;
तकरीबन बीस हमने खा लिए,
और यूँ कहो के गंगा नहा लिए।

रात भर पेट से आती रही आवाज़,
और अंदरूनी सरगर्मियों के खुल गए राज़;
तब तक तो ज़िन्दगी थी जिस्मानी,
पर तब से रोहानी ज़िन्दगी का हुआ आगाज़।

बड़े जोर से खुदा को किया याद,
और कहा, ए पालनहार, सुनले मेरी फरियाद,
तूने जब पूरी छोले इतने स्वाद बनाये थे,
सोचा क्यों नहीं क्या होगा खाने के बाद।

अगली सेहर खुदा का आया जवाब,
मैंने दुनिया में कई चीजें बनाई लाजवाब;
पर पूरी ज़िंदगी पड़ी है उन्हें खाने के लिए,
एक ही बार खाने से तो होगा पेट खराब।

सामने आ गयी सब खुदा की सच्चाई,
बुद्धा, नानक, ईसा, मोहम्मद ने नहीं थी बताई;
खुदा की दिलकश चीजों का मज़ा लेना है तो,
पहले दूध से हटा लो सारी की सारी मलाई।

क्योंकि जो चीजें बनी हों बहुत स्वाद,
उनसे हो जाती है ज़िन्दगी बर्बाद;
चखने में तो लुत्फ आ जाता है, रवि,
ग़म ही ग़म मिलते हैं खाने के बाद।

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